उत्तराखण्ड के मेले और त्यौहार

हर मेला सम्बन्धित ज़िले की सरकारी वेबसाइट या उत्तराखण्ड पर्यटन के पृष्ठ से लिया गया है।

10 ज़िलों के 26 मेले

मेलाज़िलास्थानसमयस्रोत
जागेश्वर मानसून महोत्सवअल्मोड़ाजागेश्वर15 जुलाई से 15 अगस्तalmora.nic.in
नंदा देवी महोत्सवअल्मोड़ा—सितम्बरalmora.nic.in
स्याल्दे बिखौती मेलाअल्मोड़ाद्वाराहाटविशुवत संक्रांति (अप्रैल)uttarakhandtourism.gov.in
उत्तरायणी मेलाबागेश्वर—जनवरी (मकर संक्रांति)bageshwar.nic.in
नंदा देवी राज जातचमोली—लगभग बारह वर्ष में एक बारchamoli.gov.in
देवीधुरा मेला (बग्वाल)चम्पावतदेवीधुरा (वाराही मंदिर)रक्षाबंधन (अगस्त)champawat.nic.in
पूर्णागिरि मेलाचम्पावतपूर्णागिरिचैत्र नवरात्रि (मार्च–अप्रैल)champawat.nic.in
बिस्सू मेलादेहरादूनचकराता—dehradun.nic.in
झंडा मेलादेहरादूनगुरु राम राय दरबारहोली के पाँचवें दिनdehradun.nic.in
लक्ष्मण सिद्ध मेलादेहरादूनलक्ष्मण सिद्धप्रत्येक रविवार; अप्रैल का अंतिम रविवारdehradun.nic.in
महासू देवता मेला (जागड़ा)देहरादूनहनोलअगस्तdehradun.nic.in
टपकेश्वर मेलादेहरादूनटपकेश्वरशिवरात्रिdehradun.nic.in
कांवर यात्राहरिद्वार—जुलाईharidwar.nic.in
हरिद्वार में कुंभ मेलाहरिद्वार—हर बारह वर्ष मेंharidwar.nic.in
बिनसर मेलापौड़ी गढ़वालबिन्देश्वर महादेव मंदिरवैकुंठ चतुर्दशी और कार्तिक पूर्णिमाpauri.nic.in
गिंदी मेलापौड़ी गढ़वालडाडामंडी और थलनदीमकर संक्रांति (जनवरी)pauri.nic.in
वैकुंठ चतुर्दशी मेलापौड़ी गढ़वालकमलेश्वर महादेव मंदिर, श्रीनगरकार्तिक (शुक्ल चतुर्दशी)pauri.nic.in
छिपला जाटपिथौरागढ़—भादो पूर्णमासी, हर तीसरे वर्षpithoragarh.nic.in
हिलजात्रापिथौरागढ़——pithoragarh.nic.in
जौलजीबी और थल मेलापिथौरागढ़——pithoragarh.nic.in
कंडालीपिथौरागढ़चौदांसअगस्त से अक्टूबर के बीचpithoragarh.nic.in
बैसाखी मेलारुद्रप्रयागमंदाकिनी घाटी13–14 अप्रैलrudraprayag.gov.in
हरियाली देवी मेलारुद्रप्रयागहरियाली देवी मंदिरनवरात्र (सितम्बर–अक्टूबर)rudraprayag.gov.in
मदमहेश्वर मेलारुद्रप्रयागऊखीमठ—rudraprayag.gov.in
अंदूरी उत्सवउत्तरकाशीरैथलअगस्त और सितम्बर के बीचuttarakhandtourism.gov.in
माघ मेलाउत्तरकाशी——uttarkashi.nic.in

हर मेले के बारे में

जागेश्वर मानसून महोत्सव (अल्मोड़ा)
जागेश्वर में धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व का महोत्सव.
नंदा देवी महोत्सव (अल्मोड़ा)
क्षेत्र का सबसे प्रसिद्ध मेला, चंद राजाओं के समय से; अल्मोड़ा का नंदा मंदिर, जिसे सत्रहवीं शताब्दी में द्योत चंद ने बनवाया, इसका केन्द्र है और महोत्सव पाँच दिन चलता है. पिथौरागढ़ ज़िला पृष्ठ के अनुसार नंदा देवी मेले अल्मोड़ा, नैनीताल, कोट (दंगोली) तथा जोहार के मिलम और मरतोली जैसे गाँवों में भी लगते हैं।
स्याल्दे बिखौती मेला (अल्मोड़ा)
द्वाराहाट में विशुवत संक्रांति पर, एक प्राचीन विजय की स्मृति में; संगीत, गीत और नृत्य के साथ. बागेश्वर ज़िला पृष्ठ के अनुसार इस दिन द्वाराहाट, स्याल्दे, चौगड़ और लोहाखाई में मेले लगते हैं।
उत्तरायणी मेला (बागेश्वर)
कुमाऊँ क्षेत्र के सबसे बड़े मेलों में से एक, एक सप्ताह तक चलता है; मकर संक्रांति पर बागेश्वर में नदियों में स्नान किया जाता है. नैनीताल ज़िला भी रानीबाग के पास चित्रशिला में मकर संक्रांति पर उत्तरायणी मेले का उल्लेख करता है।
नंदा देवी राज जात (चमोली)
ज़िले के अनुसार उत्तराखण्ड के कुछ प्रसिद्ध सांस्कृतिक आयोजनों में से एक धार्मिक यात्रा, जो लगभग बारह वर्ष में एक बार होती है; ज़िला पृष्ठ के अनुसार पिछली जात 2014 में हुई थी. अगली जात की तिथि या यात्रा मार्ग बताने वाला कोई आधिकारिक पृष्ठ नहीं मिला।
देवीधुरा मेला (बग्वाल) (चम्पावत)
देवीधुरा के वाराही मंदिर में; बग्वाल रक्षाबंधन के दिन होती है. उत्तराखण्ड पर्यटन के अनुसार 2013 में उच्च न्यायालय के निर्देश पर बग्वाल में पत्थरों के स्थान पर फूल और फल प्रयोग किए जाने लगे।
पूर्णागिरि मेला (चम्पावत)
पूर्णागिरि मंदिर में वर्ष भर श्रद्धालु आते हैं और चैत्र नवरात्रि में सबसे अधिक; मंदिर टनकपुर से 20 किमी दूर है.
बिस्सू मेला (देहरादून)
चकराता के झंडा मैदान में; जौनसारी जनजाति की संस्कृति को दर्शाता है और फसल कटाई के मौसम का प्रतीक है, जिसमें टिहरी, उत्तरकाशी और सहारनपुर से लोग आते हैं. उत्तराखण्ड पर्यटन के अनुसार बिस्सू मेला मसूरी से लगभग 5 किमी दूर कैम्प्टी के पास संतूरा देवी मंदिर में भी चैत्र में लगता है।
झंडा मेला (देहरादून)
देहरादून के ऐतिहासिक गुरु राम राय दरबार में; नया झंडा चढ़ाने से मेला आरम्भ होता है, और पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश तथा हिमाचल प्रदेश से श्रद्धालु आते हैं. देहरादून ज़िला पृष्ठ होली के पाँचवें दिन बताता है, जबकि उत्तराखण्ड पर्यटन छठे दिन। दोनों सरकारी हैं; यहाँ ज़िले का विवरण लिया गया है।
लक्ष्मण सिद्ध मेला (देहरादून)
हर रविवार लगने वाला स्थानीय धार्मिक मेला, देहरादून से ऋषिकेश मार्ग पर लगभग 10 किमी दूर; अप्रैल का अंतिम रविवार विशेष महत्व रखता है.
महासू देवता मेला (जागड़ा) (देहरादून)
हनोल में, जब महासू देवता की शोभायात्रा निकलती है और तीन दिन-रात संगीतमय प्रार्थना चलती है. दोनों सरकारी पृष्ठ हनोल की दूरी अलग बताते हैं (चकराता–त्यूनी मार्ग पर 120 किमी; चकराता से 95 किमी), इसलिए यहाँ दूरी नहीं दी गई।
टपकेश्वर मेला (देहरादून)
बस स्टैंड से लगभग 5 किमी दूर टपकेश्वर मंदिर में हज़ारों श्रद्धालु पूजा के लिए एकत्र होते हैं.
कांवर यात्रा (हरिद्वार)
वार्षिक यात्रा जिसमें शिव भक्त कांवड़िये हरिद्वार, गौमुख या गंगोत्री से गंगाजल लेकर, प्रायः नंगे पाँव चलकर, अपने घर ले जाते हैं.
हरिद्वार में कुंभ मेला (हरिद्वार)
कुंभ हर बारह वर्ष में होता है; ज़िला वेबसाइट के अनुसार 2003 के कुंभ में हरिद्वार में एक करोड़ से अधिक श्रद्धालु एकत्र हुए.
बिनसर मेला (पौड़ी गढ़वाल)
चौथान पट्टी और दूधातोली के जंगलों के बीच बिन्देश्वर महादेव मंदिर में दो दिन का मेला, जिसमें पौड़ी, चमोली, अल्मोड़ा और रुद्रप्रयाग से लोग आते हैं.
गिंदी मेला (पौड़ी गढ़वाल)
मकर संक्रांति पर डाडामंडी और थलनदी जैसे स्थानों पर गिंदी मेले लगते हैं, जिनमें गाँववालों की दो टोलियाँ खुले मैदान में गेंद के लिए खेलती हैं.
वैकुंठ चतुर्दशी मेला (पौड़ी गढ़वाल)
श्रीनगर के कमलेश्वर महादेव मंदिर में; पहले मंदिर परिसर में एक दिन का मेला था, अब नगर पालिका द्वारा पाँच दिन का किया गया है.
छिपला जाट (पिथौरागढ़)
धारचूला और गोरीखाल क्षेत्र के 15–20 गाँवों के लोग हर तीसरे वर्ष केदारद्वे और नजुरीकोट पहुँचते हैं; मुख्य यात्रा तवाघाट के पास खेला गाँव से आरम्भ होती है.
हिलजात्रा (पिथौरागढ़)
पशुपालकों और किसानों का पर्व, जो पश्चिमी नेपाल से पिथौरागढ़ घाटी में आया; यह रोपाई से जुड़ा है और खुले में होने वाला विस्तृत मुखौटा नृत्य है.
जौलजीबी और थल मेला (पिथौरागढ़)
मुख्यतः व्यापारिक मेले, जिन्होंने लोक संस्कृति को बनाए रखा और ज़िले के आर्थिक जीवन का केन्द्र रहे हैं. ज़िला पृष्ठ इन दोनों को व्यापारिक मेले बताता है, पर कोई माह, अवधि या स्थान नहीं छापता।
कंडाली (पिथौरागढ़)
चौदांस क्षेत्र में तब मनाया जाता है जब कंडाली का फूल (Strobilenthes wallichii) खिलता है, जो बारह वर्ष में एक बार होता है; शौका या रं लोग सप्ताह भर विभिन्न गाँवों में यह पर्व मनाते हैं. ज़िला पृष्ठ पुराना है और बताता है कि फूल पिछली बार 1999 में खिला और अगली बार 2011 में खिलेगा; राज्य पर्यटन पृष्ठ के अनुसार पिछली बार 2011 में खिला। किसी पृष्ठ पर इसके बाद की तिथि नहीं है, इसलिए कोई वर्तमान वर्ष नहीं दिया गया।
बैसाखी मेला (रुद्रप्रयाग)
मंदाकिनी घाटी में अगस्त्यमुनि, फेगू और तलातोली जैसे स्थानों पर, जब सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है.
हरियाली देवी मेला (रुद्रप्रयाग)
हर वर्ष हरियाली देवी मंदिर में.
मदमहेश्वर मेला (रुद्रप्रयाग)
ऊखीमठ में, जब द्वितीय केदार मदमहेश्वर की डोली शीतकालीन प्रवास के बाद ओंकारेश्वर मंदिर पहुँचती है.
अंदूरी उत्सव (उत्तरकाशी)
रैथल में, दयारा बुग्याल के बुग्यालों में चरते पशुओं की रक्षा के लिए भगवान कृष्ण के प्रति आभार; लोग एक-दूसरे पर मक्खन, दूध और छाछ लगाते हैं.
माघ मेला (उत्तरकाशी)
ज़िला प्रशासन द्वारा उत्तराखण्ड के धार्मिक मेलों में गिनाया गया, सैनिक मेला और कृषि मेला के साथ. ज़िला पृष्ठ मेले का नाम देता है, पर माह, अवधि या स्थान नहीं छापता।

गंगा दशहरा और हरिद्वार का अर्ध कुंभ इस सूची में नहीं हैं, क्योंकि इनका कोई आधिकारिक पृष्ठ नहीं मिला। जहाँ दो सरकारी पृष्ठ अलग जानकारी देते हैं (जैसे झंडा मेला होली के पाँचवें या छठे दिन), वहाँ दोनों बातें तालिका के नीचे दी गई हैं। जाँच की तिथि 26 सितंबर 2026.

परीक्षा के लिए क्या याद रखें

  • उत्तरायणी मेला (बागेश्वर) मकर संक्रांति पर और कुमाऊँ के सबसे बड़े मेलों में एक है; नंदा देवी महोत्सव (अल्मोड़ा) सितम्बर में पाँच दिन चलता है।
  • देवीधुरा की बग्वाल रक्षाबंधन के दिन वाराही मंदिर में होती है; पूर्णागिरि मेला चैत्र नवरात्रि (मार्च–अप्रैल) में।
  • झंडा मेला देहरादून के गुरु राम राय दरबार में होली के बाद लगता है; बिस्सू मेला चकराता में जौनसारी संस्कृति और फसल कटाई से जुड़ा है।
  • कंडाली (पिथौरागढ़) तब मनाया जाता है जब बारह वर्ष में एक बार कंडाली का फूल खिलता है; नंदा देवी राज जात भी लगभग बारह वर्ष में एक बार होती है।

हर तथ्य सरकारी वेबसाइट से लिया गया है और उसका स्रोत दिया गया है। जहाँ दो आधिकारिक स्रोतों में अंतर है, वहाँ दोनों आँकड़े दिखाए गए हैं।

अभ्यास करें

इस पृष्ठ के सत्यापित डेटा से बने 10 प्रश्न। हर उत्तर के साथ उसका आधिकारिक स्रोत दिया गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

उत्तराखण्ड का सबसे बड़ा मेला कौन सा है?

बागेश्वर ज़िला वेबसाइट उत्तरायणी मेले को कुमाऊँ क्षेत्र के सबसे बड़े मेलों में से एक बताती है; यह मकर संक्रांति पर एक सप्ताह तक चलता है।

बग्वाल कहाँ और कब होती है?

चम्पावत ज़िले के देवीधुरा में वाराही मंदिर में, रक्षाबंधन के दिन। 2013 में उच्च न्यायालय के निर्देश पर पत्थरों की जगह फूल और फल प्रयोग किए जाने लगे (उत्तराखण्ड पर्यटन)।

नंदा देवी राज जात कितने वर्ष में होती है?

चमोली ज़िला वेबसाइट के अनुसार लगभग बारह वर्ष में एक बार; पिछली जात 2014 में हुई थी। अगली जात की तिथि किसी आधिकारिक पृष्ठ पर नहीं मिली।

कंडाली पर्व क्यों बारह वर्ष में एक बार होता है?

क्योंकि यह कंडाली (Strobilenthes wallichii) के फूलने से जुड़ा है, जो बारह वर्ष में एक बार खिलता है। पर्व अगस्त और अक्टूबर के बीच सप्ताह भर चलता है।

हिलजात्रा क्या है?

पिथौरागढ़ का पशुपालकों और किसानों का पर्व, जो पश्चिमी नेपाल से आया; यह रोपाई से जुड़ा है और खुले में मुखौटा नृत्य के रूप में मनाया जाता है।

स्रोत

  1. bageshwar.nic.in/culture-heritage/, District administration
  2. uttarakhandtourism.gov.in/page/voices-and-culture, Uttarakhand Tourism
  3. almora.nic.in/fairs-festivals/, District administration
  4. champawat.nic.in/places-of-interest/, District administration
  5. champawat.nic.in/tourist-place/purnagiri/, District administration
  6. dehradun.nic.in/fair-festivals/, District administration
  7. pauri.nic.in/fairs-festivals/, District administration
  8. rudraprayag.gov.in/culture-heritage/, District administration
  9. pithoragarh.nic.in/culture-heritage/, District administration
  10. haridwar.nic.in/about-kumbh/, District administration
  11. haridwar.nic.in/culture-festivals/, District administration
  12. uttarkashi.nic.in/culture-heritage/, District administration
  13. chamoli.gov.in/video/nanda-devi-raj-jat-yatra-2014/, District administration

इन स्रोतों से नियमों का मिलान किया गया: 26 सितंबर 2026 स्रोत लिंक नई टैब में खुलते हैं।

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